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शान्ति जिसका कोई अस्तित्व नहीं, वास्तविकता जो स्वयं एक असत्य है।

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  • शान्ति जिसका कोई अस्तित्व नहीं, वास्तविकता जो स्वयं एक असत्य है।

    मनुष्य की किंकर्तव्यविमूढ़ता ने उसे आज ऐसे स्थान पर पहुंचा दिया है जिसके कारण वह स्वयं का अस्तित्व खो चुका है। मनुष्य को आधुनिकता ने एक ऐसे अंधकार को जन्म दिया है जिसमें इच्छाएं तो है लेकिन प्रेम नहीं,आराम तो है सूकून नहीं ,सुविधाएं तो है पर घर नहीं,भारत तो है परंतु भारतीयता नहीं। और आज मुझे पुराण का वो श्लोक याद आता है जिसका अब अस्तित्व नहीं - "गायन्ति देवा किल गीतकानि ,धन्यास्तु ते भारत भूमि भागे ।
    स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूय: पुरुषा सुरत्वात्।।"
    अगर आप इन शब्दों का वास्तविक अर्थ समझ पायें तो आपको पता चलेगा कि भारत की तथा इस समस्त पृथ्वी की समाप्ति हो चुकी है और आज हम असत्य एवं भ्रम के अंधकार में जीवित हैं।

  • #2
    Originally posted by GreenBull View Post
    "गायन्ति देवा किल गीतकानि ,धन्यास्तु ते भारत भूमि भागे ।
    स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूय: पुरुषा सुरत्वात्।।"
    इन वर्णनों के अनुसार भारत को ही राष्ट्र कहना चाहिये था,

    Am i right?

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    • #3
      Originally posted by freekundli View Post

      इन वर्णनों के अनुसार भारत को ही राष्ट्र कहना चाहिये था,

      Am i right?
      एक राष्ट्र नहीं अपितु एक मार्ग स्वर्ग एवं अपवर्ग अर्थात नरक के ओर। व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से होती है और ये कर्म ही स्वर्ग और नरक के वास्तविक द्वार हैं।

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      • #4
        हालाकी आपने बिल्कुल सही फरमाया है, आज पूरी दुनिया 'भारत' की ओर देख रही है, उसी सीधांतोंका अनुसरण करने जा रही है | इंसान ने शांति क्यों खो दी है - इसका ये भी एक कारण है की आधुनिकता की ओर खींचे जा रहा है, हम कहांसे आये है, हम कौन है - इस धरतीपर अपना अस्तीत्व क्यों है, इसकी खोज करनेकी आवश्यकता है | जिस दिन आदमी इस सवाल का सही सही जवाब ढूंढने लगेगा तो अपने आप सूखी होगा | भारतीयता अपनोमे जगानी होगी तोही इस प्रूथ्वी का उद्धार होगा |

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